झूठा आरोप

झूठा आरोप

बहुत पुरानी बात है। पंजाब के एक छोटे से गाँव में जीवन और मदन दो मित्र रहते थे। उनकी अटूट दोस्ती के किस्से दूर-दूर तक फैले हुए थे। जीवन एक अमीर परिवार से था, परंतु मदन के परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी। मदन अपने माता-पिता की आखिरी उम्मीद था, परंतु मदन को इस बात का एहसास नहीं था। मदन 18 साल की उम्र में भी एक बच्चे की तरह हरकते करता था। जीवन ने उसे समझाने का बहुत प्रयास किया, परंतु हर बार उसकी मेहनत बेकार जाती। जीवन के पिता एक जाने-माने किसान थे और उसके पास अच्छी जमीन भी थी। जीवन पढ़ाई में बहुत अच्छा था, परंतु मदन पढ़ाई में भी अच्छा नहीं था। विद्यालय में मदन बस अपने दोस्तों को हँसाने जाता था। उन्हें यह एहसास करवाता था कि वो बहुत खास है। मदन में अगर कोई खासियत थी, तो यह कि वह एक बहुत अच्छा खिलाड़ी था। खेल में तो कोई मदन के आसपास भी नहीं था। जीवन भी नहीं। मदन कुश्ती में बड़े से बड़े खिलाड़ी को भी मिनटों में हरा देता था। मदन के भारी शरीर को देखकर उससे कोई पंगा नहीं लेता था। लोग मदन को एक गुंडा समझते थे और शायद इसी कारण मदन अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी मुसीबत में पड़ गया। एक रात जब मदन पास के गाँव में आयोजित कुश्ती प्रतियोगिता में हिस्सा लेकर वापस अपने गाँव लौट रहा था। अचानक उसे पड़ोसी गाँव के कुछ लड़कों ने घेर लिया। वे मदन से कुश्ती में मिली हार का बदला लेना चाहते थे।

मदन शक्तिशाली था, परंतु वह अकेला क्या करता। मदन ने बहुत कोशिश की, उन लड़कों को मारा भी, पर वह खुद भी पिट गया। वे लड़के मदन को अधमरा करके वही छोड़ गए। वह जगह सुनसान थी। दूर-दूर तक कोई दिखाई नहीं दे रहा था। मदन ने हिम्मत नहीं हारी। वह जीवन के घर पहुँचा।

जीवन ने पूछा, “मदन, मेरे दोस्त! क्या हुआ? यह सब कैसे हुआ?”

मदन, “जीवन मेरे दोस्त! यह उन्हीं लड़कों का काम है जिन्हें मैंने कुश्ती में हराया था। यार मेरे घरवालों को मत बताना। वे बहुत परेशान होंगे। तुम ये पैसे रखो मैंने कुश्ती में जीते हैं। जीवन यार अगर तुम बुरा ना मानो तो क्या मैं कुछ दिन तुम्हारे पास रह सकता हूँ?”

जीवन, “क्या बात करता है यार? ये भी कोई पूछने वाली बात है।”

मदन, “जीवन, तू मेरा पक्का दोस्त है यार।”

अचानक कोई ज़ोर-ज़ोर से दरवाजा खटखटाता है। जीवन दरवाजा खोलता है। चार-पाँच सैनिक कमरे में घुस आते हैं और मदन को पकड़ लेते हैं।

मदन, “छोड़ दो मुझे।”

जीवन, “अरे तुम इसे क्यों पकड़ रहे हो?”

सैनिक, “ये तो कल राजा के दरबार में पता चलेगा।”

सैनिक जीवन को पकड़ कर ले जाते हैं। अगले दिन ‘जीवन’ को राज दरबार में पेश किया जाता है।

राजा, “कौन है यह बालक ? क्या अपराध किया है इसने?”

सैनिक, “महाराज! आपकी आज्ञा हो तो मैं उन लड़कों को दरबार में बुलाना चाहता हूँ, जिन्होंने इसपर चोरी का आरोप लगाया है।”

राजा, “आज्ञा है।”

 

सैनिक सभी लड़कों को दरबार में बुलाता है। उन लड़कों को वहाँ देखकर मदन को आश्चर्य होता है। उन लड़कों में से एक लड़का बोलता है, “महाराज इसने हमारे पैसे छीने हैं। यही नहीं जब हमने इसका विरोध किया तो यह हमारे साथ मार-पीट भी करने लगा। महाराज इसे सख्त से सख्त सजा दीजिए।”

मदन, “नहीं महाराज मैंने कोई चोरी नहीं की। मैंने किसी के पैसे नहीं छीने।”

राजा, “तुम्हारे पास क्या सबूत है कि तुम चोर नहीं हो?”

मदन, “महाराज गुस्ताखी माफ! पर इनके पास क्या सबूत है कि चोरी मैंने की है?”

लड़का, “महाराज यह कल रात कि बात है। हम सभी दोस्त एक जगह बैठे अपने काम का हिसाब-किताब कर रहे थे। आचानक हमें बचाओ…. बचाओ…. की आवाज सुनाई दी। हमने देखा यह घायल अवस्था में पड़ा हुआ चिल्ला रहा था। हमने इसकी मदद की और यह हमारे पैसे चुराकर भाग गया। हमने इसे रोकना भी चाह पर इसने हमारे ऊपर पत्थरों से हमला कर दिया।“

राजा, “मुझे तुम्हारी बात सच लग रही है। हे लड़के क्या नाम है तुम्हारा?”

मदन, “महाराज मेरा नाम ‘मदन’ है।”

राजा, “इसे 30 दिन के लिए कारागार में डाल दो।”

मदन को कारागार में डाल दिया जाता है। राजा का फैसला बदला नहीं जा सकता था। यह सब जीवन भी देख रहा था। जीवन से फैसला किया कि वह जानकर रहेगा कि आख़िर बात क्या है? जीवन उन लड़को का पीछा करता है और उनकी बातें सुनता है।

लड़का, “अरे ये अच्छा हुआ। अब तो 10 दिन बाद गाँव में होने वाली कुश्ती प्रतियोगिता हम में से ही कोई जीतेगा।”

जीवन को सारी बात समझ में आ गई। अगले दिन जीवन महाराज के सामने जाकर पूरी बात बता देता है। महाराज सैनिकों को भेजकर उन लड़कों को बुलवाता है। लड़के अपनी गलती मान जाते हैं। महाराज ने दरबार में सबके सामने मदन को आज़ाद कर दिया और झूठ बोलने वाले लड़कों को एक-एक साल की सजा सुनाई।

 

राजा, “मदन तुम आज से आज़ाद हो। तुम्हें बेगुनाह होते हुए भी दो दिन कारागार में रहना पड़ा। इसका हमें खेद है। हम तुम्हें कुछ देना चाहते हैं, मांगो तुम्हें क्या चाहिए?”

मदन, “महाराज, मैं चाहता हूँ आप इन सब लड़कों को छोड़ दो।”

राजा, “अगर तुम्हारी यही इच्छा है तो ठीक है।”

सभी लड़के मदन से माफी मांगते है और मदन को कुश्ती में अपना गुरु बना लेते हैं।

जैसलीन   कौर

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