संत कवि रविदास जी

संत कवि रविदास जी

इतिहासकारों ने हिन्दी साहित्य के मध्यकाल को ‘भक्तिकाल’ नाम दिया है। भक्तिकाल हिन्दी साहित्य का श्रेष्ठ युग है। हिन्दी साहित्य की उत्तम रचनाएं और समस्त श्रेष्ठ कवि इस युग में हुए हैं। भक्तिकाल में विभिन्न मतों का आधार लेकर निर्गुण और सगुण के नाम से दो शाखाएँ साथ-साथ चलीं। निर्गुणमत आगे दो उपशाखाएँ में प्रवाहित हुआ : ज्ञानाश्रयी और प्रेमाश्रयी।

 

 

सगुणमत भी दो उपशाखाएँ में प्रवाहित हुआ – रामभक्ति और कृष्णभक्ति।

ज्ञानाश्रयी शाखा के कवि निर्गुणवादी थे और नाम की उपासना करते थे। गुरु का वे बहुत सम्मान करते थे और मिथ्या आडंबरों और रूढियों का विरोध करते थे।

संत कवि रविदास जी (रैदास) ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रमुख कवि थे।

 

संत कवि रविदास जी के जन्म के विषय में प्रामाणिक जानकारी जानकारी उपलब्ध नहीं है। मूर्तिपूजा, तीर्थयात्रा जैसे दिखावों में संत कवि रविदास जी का बिल्कुल भी विश्वास नहीं था। वह व्यक्ति की आंतरिक भावनाओं और आपसी भाईचारे को ही सच्चा धर्म मानते थे।  संत कवि रविदास जी के अनेक पद सिखों के पवित्र धर्मग्रंथ ‘गुरुग्रंथ साहब’ में भी सम्मिलित हैं।

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