क़ातिल कौन ?

क़ातिल कौन ?

सुबह-सुबह कोर्ट के बाहर भीड़ जमा है। आज सोहन कपूर के केस की सुनवाई है, सोहन कपूर पर हत्या का आरोप लगा है। कोर्ट की सुनवाई आरंभ होती है। सवाल-जवाब चलते हैं। सोहन का केस कमज़ोर पड़ रहा है। सोहन कपूर के वकील जज से सोहन की बेगुनाही साबित करने के लिए एक और मौका माँगते हैं। जज बेगुनाही साबित करने का आखरी मौका दे देता है।  अब चार दिन बाद केस की सुनवाई दोबारा होगी। सोहन का दोस्त राहुल उसे जेल में मिलने आता है।

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सोहन, “राहुल यार, तुम उस आदमी को ढूंढो, जो मेरे पक्ष में गवाही दे सकता है। केवल वही मुझे बेगुनाह साबित कर सकता है। क्योंकि केवल वही जानता है कि मैंने कोई हत्या नहीं की।”

राहुल, “मैंने उस आदमी की बहुत तलाश की, लेकिन उसका कुछ पता नहीं चला। अब मैं कहाँ तलाश करूं उस आदमी को? पता नहीं वह कहाँ छुपकर बैठा होगा!”

सोहन, “हे भगवान्!”

पीछे से आवाज आती है, “मुलाकात का समय समाप्त हुआ।”

सोहन, “राहुल, तुमतो जानते हो, मैं यहाँ फसा हुआ हूँ और वहाँ काजल का रो-रो कर हाल बेहाल है। प्लीज यार उसका होंसला बनाए रखना।“

राहुल, “चिंता मत करो दोस्त। काजल बहुत साहसी लड़की है, वो इतनी जल्दी होंसला नहीं हारेगी। तुम्हें बचाने के लिए वो दिन-रात इस केस में लगी हुई है।”

राहुल, सोहन से गले मिलता है और चला जाता है। राहुल बाहर आता है तो देखता है कि काजल एक आदमी के साथ आई है और जेल वार्डन से अपील कर रही है कि उसे सोहन से मिलने दिया जाए। जेल वार्डन साफ मना कर देता है।

राहुल, “अरे काजल तुम यहाँ ?”

काजल, “राहुल तुम!”

राहुल, “मैं सोहन से मिलने आया था।”

काजल, “इनसे मिलो ये मेरे पापा के दोस्त हैं, ‘दया’।”

राहुल हाथ मिलाते हुए, “आपसे मिलकर खुशी हुई!”

दया, “मुझे भी!”

काजल, “ये सोहन को बचाने में हमारी मदद करना चाहते हैं।”

दया, “मैं एक बार सोहन से मिलना चाहता हूँ। लेकिन जेल वार्डन कहते हैं कि आज उनसे और कोई नहीं मिल सकता।”

सब मिलकर जेल वार्डन से अपील करते हैं। जेल वार्डन मिलनी की अनुमती दे देता है। काजल सोहन को सब समझाती है कि किस तरह दया उनकी मदद कर सकता है।

दया, “ठीक से याद करके बताओ उस रात क्या-क्या हुआ था ?”

सोहन, “उस रात मैं एक पार्टी से वापस आ रहा था। रास्ते में आते समय मेरी गाड़ी के सामने अचानक एक घायल आदमी आकर गिर गया। उसके पेट में चाकू लगा हुआ था। मैंने गाड़ी रोकी और उसके पास गया। उस समय उसकी साँसें चल रही थीं। मैंने उसके पेट से चाकू निकालने की कोशिश कि लेकिन वह मर गया। वहाँ एक आदमी ने मुझे चाकू निकालते हुए देख लिया और उसने पुलिस को फोन कर दिया। उस समय मैं बहुत घबरा गया था। मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था। मैं वहाँ से भाग गया।”

 

दया, “फिर क्या हुआ ?”

सोहन, “अगले दिन मैं शहर छोड़ कर अपने घर वापस आ गया। 2 साल बाद मेरे दोस्त राहुल की शादी थी। उसने मुझे शादी में बुलाया। शादी उसी शहर में थी। मैं शादी में तो आ गया लेकिन हर वक्त यही डर लगा रहता था कि कहीं पुलिस न पकड़ले। शादी के अगले दिन जब मैं वापस जाने वाला था, उसी समय हमारे दरवाजे पर एक आदमी पुलिस को लेकर आ गया। यह वही आदमी था जिसने पुलिस को फोन किया था। पुलिस ने मुझे गिरफ्तार कर लिया।”

दया, “जिस समय वह आदमी तुम्हारी गाड़ी के आगे आकर गिरा और तुमने उसके पेट से चाकू निकाला। उस समय वहाँ कोई और भी था, जो यह जानता हो कि तुम बेगुनाह हो?”

सोहन, “उस समय एक चायवाला अपनी दुकान पर मौजूद था। बस वही मुझे बचा सकता है। लेकिन पता नहीं वह कहाँ है!”

दया, “अगर तुम बेगुनाह हो तो चिंता करने की कोई बात नहीं है। मैं उस चायवाले को पाताल से भी खोजकर ले आऊंगा।”

कोर्ट में केस की सुनवाई शुरू होती है। सोहन का वकील, काजल, राहुल और सोहन के सभी रिश्तेदार कोर्ट में मौजूद हैं। सबके मुहँ उतरे हुए हैं। दया कोर्ट में मौजूद नहीं है और उसका मोबाईल भी बंद है। कोर्ट की सुनवाई चलती है। लगभग दो घण्टे सवाल-जवाब के बाद जज फैसला सुनाने लगता है।

जज, “तमाम सबूतों और गवाहों को मद्देनजर रखते हुए अदालत इस नतीजे पर पहुँची है कि सोहन कपूर ने हत्या की है। यह अदालत सोहन कपूर को धारा 302 के तहद…” बीच में ही एक आवाज आती है…. “ठहरो जज साहब”

सब एक दम से पलटकर देखते हैं। दया एक आदमी को साथ लेकर आया है।

सोहन दया के साथ आए आदमी को देखकर चिल्लाता है, “जज साहब यही है वो चायवाला जो वहाँ मौजूद था।”

जज, “ऑडर… ऑडर…”

दया, “जज साहब यह आदमी सोहन की बेगुनाही का सबसे बड़ा सबूत है।”

जज, “जो भी कहना है कठखड़े में आकर कहो।”

दया, “जज साहब जो भी कहेगा, ये भोला-सा दिखनेवाला चायवाला कहेगा।”

चायवाला गीता पर हाथ रखकर कसम खाता है, “मैं गीता पर हाथ रखकर कसम खाता हूँ, जो भी कहुँगा, सच कहुँगा सच के सिवा कुछ नहीं कहुँगा।”

जज, “बताओ तुम क्या जानते हो इस केस के बारे में ?”

चायवाला, “जज साहब, वो क़त्ल मैंने किया था।”

जज, “क्या मतलब ?”

चायवाला, “उस दिन एक आदमी मेरी दुकान पर चाय पीने आया। उसके पास एक बैग था। जब मैंने उससे चाय के पैसे माँगे तो उसने बैग में से मुझे एक हज़ार का नोट दिया और बोला ‘ऐश करो’। जज साहब वो बैग हज़ार-हज़ार के नोटों से भरा हुआ था। मेरे मन में लालच आ गया और मैंने उसे चाकू से मार दिया। तभी वहाँ एक आदमी आ गया। उसे देखकर मैं बैग लेकर अपनी दुकान में आ गया। तभी वहाँ सोहन आ जाता है और उस घायल आदमी के पेट से चाकू निकालता है। जिस आदमी को देखकर मैं दुकान में छुपा था, उस आदमी को लगा की कत्ल सोहन ने किया है और उसने पुलिस को फोन कर दिया। इस तरह मैं बच गया और सोहन कत्ल के केस में फस गया।” जज सोहन को बाइज्जत रिहा कर देते हैं।

सभी दया का धन्यवाद करते हैं।

दर्शदीप कौर

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